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चाँद  शायरी

 

बहुत दूर है ।

पास होके भि दूर हो ।

बहोत मजबूर हो ।

पास होके भि पास नहीं होते ।

हम चैन से सोकर भि नहीं सोते ।



चाँद कितना दूर है ।

पर हर रोज निकलता है ।

अपने हूर के साथ ।

क्युकी वो नहीं नशे मे चूर ।

गुमान को रखता सदा खुद से दूर ।

उसकी कोई मजबूरी नहीं जो रख सके हमको दूर ।


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By Shivam Kumar Mishra

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