bhagwan, Parmeshwar, Jagdish, Parmatma, Prabhu, Vidhata, Ishwar hindi kavita

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हीरे जेवरात कि मूझे ज़रुरत क्या ।

मैं तो भक्ती भाओ का भूखा हु ।

जो दान स्वरूप तुने मूझे दिया ।

अपने पाप को कम है किया ।

ये गलतफेहमी मे मत रहना ऐ इंसान ।

जो पाप किया वो पुन्य हो गया ।

जो  बोया है ।

वो काटेगा ।


गरीब को बेघर ।

करके तुने अपना महल बनाया ।

जिस कस्ती मे तु सवार ।

उसपे मेरी क्रोध की छाया ।

सिर्फ पैसे कि माया ।

ने तुम्हे अंधा बनाया ।

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मैने कभी सोचा नहीं ।

की तुम मूझे इतना रुलाओगे ।

मेरा इंसान ही मूझे तड़पायेगा ।

मेरी रचना इतनी स्वार्थी है ।



By Shivam Kumar Mishra


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