insaan kavita, insaaniyat, hindi kavita, manushya, manav

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कमज़ोर नहीं  मजबूर हु मैं ।

अपने ही घमंड मे चूर हु मैं ।

अपने सगो को जाना नहीं ।

मैने ऊनको पेहचाना नहीं ।


इंसान के रुप मे जन्म लिया ।

सत्ता के मोह मे पाप किया ।

इंसानियत नहीं है मुझमे ।

ह्यवानीयत भरी पड़ी मुझमे ।


जो पुन्य किया वो भि खो गया ।

पैसे के लोभ मे ये क्या किया ।

ना जाने ये कैसे हो गया  ।

सैतानो की दुनिया मे ।


ये इंसान कहाँ खो गया ।

ये इंसान कहाँ खो गया ।



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इंसान ने इंसानियत खोई ।

अपना लिया हैवानियत को ।

इंसान इंसान को रोँध रहा ।

खूद को खुदा वो मान रहा ।


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By Shivam Kumar Mishra




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